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कहानी उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की है, जहाँ से आजकल प्रियंका की चाची मेनका गांधी सांसद हैं। जिले के एक छोटे से गाँव में ठाकुर साहब रहते थे। ठाकुर साहब के बारे में दो बातें विख्यात थी एक तो वो काँग्रेस पार्टी बड़े समर्थक थे दूसरा वो खेती- ज़मीन के मामले में संपन्न थे।

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बाद के दिनों में ठाकुर साहब दूर- सुदुर तक एक और बात के लिए पहचाने जाने लगे कि वो प्रियंका गांधी को ख़ूब पसंद करते थे।

उनके सामने प्रियंका की कोई बुराई कर दे तो वो अवधी में ख़ूब गरियाते थे। प्रियंका को देखने और सुनने के लिए ठाकुर साहब अपने सारे काम धंधे छोड़कर अमेठी या रायबरेली तक चले जाते थे।

जैसे- जैसे समय बढ़ता गया ठाकुर साहब की प्रियंका को लेकर दीवानगी भी बढ़ती गयी। यह दीवानगी एक तरफा प्यार में बदल गई।

ठाकुर साहब शादीशुदा थे बावज़ूद इसके उनके मन में प्रियंका से शादी के सपने पलने लगे थे। गाँव भर में अपने इस प्यार को वो जता भी चुके थे। लोग उनके बारे में अजब-ग़ज़ब बातें करते थे।

कहते हैं कि एक बार प्रियंका से मिलने वो दिल्ली तक जा धमके थे और गांव वापस पहुंचकर उन्होंने गांवभर में प्रियंका से अपनी मुलाक़ात के ख़ूब किस्से सुनाये।

हालांकि वो प्रियंका से मिल पाए या नहीं ये वही जानते होंगे लेकिन गांव में अब सब लोग जान चुके थे कि ठकुरवा प्रियंका से प्यार करत है और शादी करेक ख़्वाब पाले बा।

बताने वाले सुरती मलते हुए यह भी बताते हैं कि एक बार अमेठी में ठाकुर साहब प्रियंका से हाथ मिलाने पहुँच गए थे और किसी बदनाम शायर से प्रभावित होकर उन्होंने प्रियंका का हाथ देर तक दबाए रखा था।

प्रियंका मुस्कुरा कर रह गयी लेकिन इस घटना पर ठाकुर साहब के लिए एनएसजी वालों की प्रतिक्रिया बहुत सम्मानजनक नहीं थी। अपने इस प्यार को लेकर ठाकुर साहब जगहँसाई का पात्र बन चुके थे।

स्कूली लड़के शुरू में उनके पीछे और कालांतर में सामने भी उनके मजे लेते थे लेकिन ठाकुर साहब बेपरवाह हो चुके थे। सारा काम छोड़कर प्रियंका से मुलाक़ात की जुगत में लगे रहते थे इसके लिए उन्होंने हर संभव कोशिश भी की। जहाँ ज़रूरी लगा, घूस इत्यादि में भी निवेश किया। धीरे-धीरे अपनी जमा पूंजी और बाकी संसाधन लुटा दिए।

साल था 1997. प्रियंका गांधी रॉबर्ट वाड्रा से शादी के बंधन में बंध गई। इसके बाद भी ठाकुर साहब का सनकपन कम नहीं हुआ। सनकपन इस क़दर था कि उनका पूरा परिवार बिख़रने लगा।

धन तो पहले ही लुटा चुके थे, जो थोड़ी-बहुत जमीन बाकी थी गांव वालों ने उनके सनकपन का फ़ायदा उठाकर अपने-अपने नाम करवा ली। हालत यहाँ तक पहुँच गई कि कभी गांव का सबसे समृद्ध रहा ठाकुर परिवार भीख मांगने लगा।

ठाकुर साहब ने अफ़ीम की झौंक में अपनी काल्पनिक दुनिया बना ली और कभी-कभी ये गाना गुनगुनाने लगे-
“इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुये हैं
मौत ने हमको मारा है और हम ज़िन्दगी के सताये हुये हैं”

किसी फ़िल्मी कहानी की तरह इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स नहीं हैं। प्रियंका गांधी के प्रति ठाकुर साहब की दीवानगी ने उन्हें बर्बाद कर दिया। ऐसी दीवानगी पर नेताजन हाऊ क्यूट कहकर मुग्ध हो सकते हैं पर इसके ख़तरनाक परिणामों की ख़बर पता नहीं उन्हें मिलती भी होगी या नहीं। एक नेता के लिए उनके समर्थकों की बेपरवाह भक्तई क्या गुल खिला सकती है यह हम 2014 के बाद से देख ही रहे हैं।

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